शंख सीपी रेत पानी
कृपया बिना पूर्व अनुमति के किसी भी रचना का प्रयोग न करें -कमलेश भट्ट कमल
Sunday, November 15, 2009
Wednesday, March 11, 2009
पुस्तकें एक साथ लोकार्पित
सुप्रसिद्ध गजलकार और हाइकुकार कमलेश भट्ट कमल ने अपने जीवन के 50 वर्ष 13 फरवरी 2009 को पूरे किए। कमलेश जी की पचासवीं वर्षगाँठ पर उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें एक साथ लोकार्पित हुईं। गाजियाबाद स्थित गान्धर्व संगीत महाविद्यालय के मुक्ताकाशीय मंच पर 13फरवरी 2009को गीताभ तथा हाइकु दर्पण के संयुक्त तत्वावधान में लोकार्पण समारोह में मै नदी की सोचता हूँ (गजल संग्रह) तथा अमलतास ( हाइकु संग्रह ) का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध साहित्यकार गिरिराजकिशोर ने अपने संबोधन में कहा कि अब हमें ये बेवकूफी छोड देनी चाहिए कि गजल लिखें या नहीं, यदि हिन्दी में गजल लिख सकते हैं तो जरूर लिखें क्योंकि इसमें संवेदना को तीव्रता के साथ अभिव्यक्ति करने की अपूर्व संभावनाएँ हैं। उन्होंने कहा कि हाइकु की तीन पंक्तियों में यथार्थ को व्यक्त कर देना बहुत कठिन कार्य है। अज्ञेय ने कभी कहा था कि भारतीय, जापानियों से बेहतर हाइकु लिख सकते हैं और भट्ट जी ने इसे प्रमाणित करके दिखा दिया। कार्क्रम के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध कहानीकार से.रा.यात्री ने कहा कि कमलेश जी सच्चे अर्थों में एक प्रसन्न व्यक्ति हैं उनकी काव्य सम्मत चिन्ताएँ जन जीवन से गहराई के साथ जुडी हुई हैं। डा० मधुभारती ने कमलेश भट्ट की गजलों में संप्रेषणीयता की अद्भुत क्षमता का उल्लेख किया। सुप्रसिद्ध कवि डा० कुँअर बेचैन ने कमलेश जी की गजलों को पूरे समाज से जुडा हुआ बताया। डा० अमरनाथ अमर ने कमलेश जी की रचनाओं को स्व से निकलकर सर्व तक जाती मानवीय संवेदनाओं का संकलन बताया। उन्होंने कहा कि उनकी संवेदना नदी से निकलकर मनुष्य तक पहुँचती हैं। ये भी कहा कि उनकी गजलों में बुलंदी पर जाने की इच्छाशक्ति तथा समाज का संघर्ष, चिन्तन और उसकी चिन्ता भी व्यक्त होती है। सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार कृष्ण शलभ ने कमलेश भट्ट कमल के व्यक्तित्व को व्यष्टि से समष्टि की ओर जाता हुआ बताया। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध चित्रकार डा० लाल रत्नाकर, वरिष्ट पत्रकार डा० कुलदीप तलवार, साहित्यकार बी.एल.गौड, डा० सुरेन्द्र सिंघल, डा० सरिता शर्मा, डा० अंजली देवधर, प्रकाशक हरिश्चन्द्र शर्मा आदि ने कमलेश जी के व्यक्तित्व कृतित्व तथा उनकी रचनाधर्मिता को केन्द्र में रखते हुए विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में ओमप्रकाश यती, डा० अंजू सुमन, अंजू जैन, अतुल जैन, आर.पी.कौशल, एस.एन.भट्ट, अनिल कुमार शर्मा, कालीचरन प्रेमी, ओमप्रकाश कश्यप, कुसुम भट्ट, अलका यादव, विशाख, आस्था, प्रत्यूष आदि शामिल थे। मंचस्थ अतिथियों तथा प्रकाशक हरिश्चन्द्र शर्मा को शाल उढ़ाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ अनुराधा भट्ट और जया बनर्जी द्वारा सरस्वती वंदना एवं गजल प्रस्तुति के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन डा० जगदीश व्योम तथा वेदप्रकाश शर्मा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन आजकल पत्रिका के संपादक डा० योगेन्द्र दत्त शर्मा ने किया।

Monday, March 02, 2009
Wednesday, February 18, 2009
Monday, February 16, 2009
मन स्वयं को दूसरों पर होम कर दे

मन स्वयं को दूसरों पर होम कर दे
माँ हमारी भावना तू व्योम कर दे !
ज्योति है तू ज्योत्सना का वास तुझमें
फिर अमावस से विलग तम तोम कर दे !
कुछ नहीं, कुछ भी नहीं तुझसे असम्भव
तू अगर चाहे गरल को सोम कर दे !
तू सनातन स्नेहमयि माँ, चिर तृषित हम
नेहपूरित देह का हर रोम कर दे !
धन्य हो जाए सृजन की पूत वीणा
माँ कृपा कर तू स्वरों को ओम कर दे !
- कमलेश भट्ट कमल
(सद्य प्रकाशित गजल संग्रह मैं नदी की सोचता हूँ से )
Wednesday, June 20, 2007
Saturday, January 13, 2007
Sunday, December 24, 2006
Monday, October 02, 2006
भले ही मुल्क के (ग़ज़ल)
भले ही मुल्क के हालात में तब्दीलियाँ कम हों
किसी सूरत गरीबों की मगर अब सिसकियाँ कम हों।
तरक्की ठीक है इसका ये मतलब तो नहीं लेकिन
धुआँ हो, चिमनियाँ हों, फूल कम हों, तितलियाँ कम हों।
फिसलते ही फिसलते आ गए नाज़ुक मुहाने तक
जरूरी है कि अब आगे से हमसे गल्तियाँ कम हों।
यही जो बेटियाँ हैं ये ही आखिर कल की माँए हैं
मिलें मुश्किल से कल माँए न इतनी बेटियाँ कम हों।
दिलों को भी तो अपना काम करने का मिले मौका
दिमागों ने जो पैदा की है शायद दूरियाँ कम हों।
अगर सचमुच तू दाता है कभी ऐसा भी कर ईश्वर
तेरी खैरात ज्यादा हो हमारी झोलियाँ कम हों।
-कमलेश भट्ट कमल
Tuesday, September 05, 2006
बेशक छोटे हों लेकिन (ग़ज़ल)
बेशक छोटे हों लेकिन धरती का हिस्सा हम भी हैं
जैसे प्रभु की सारी रचना, वैसी रचना हम भी हैं।
इतना भी आसान नहीं है पढ़ना और समझ पाना
सुख की दुख की संघर्षों की पूरी गाथा हम भी हैं।
आज नहीं हो कल तुमको भी साथ हमारे चलना है
एक ज़माना तुम भी थे तो एक ज़माना हम भी हैं।
फ़न ने ही हमको दी है मर्यादा जीने मरने की
तो फिर फन के जीने मरने की मर्यादा हम भी हैं।
ईश्वर ने तो लिख रक्खा है सबके माथे पर लेकिन
अपने सुख के अपने दुख के एक विधाता हम भी हैं।
जब जब भी इच्छा होती है रास रचा लेते हैं हम
अपने मन के वृंदावन के छोटे कान्हा हम भी हैं।
-कमलेश भट्ट कमल
सफलता पाँव चूमे ग़ज़ल
ग़ज़ल
सफलता पाँव चूमे गम का कोई भी न पल आए
दुआ है हर किसी की जिन्दगी में ऐसा कल आए।
ये डर पतझड़ में था अब पेड़ सूने ही न रह जाएँ
मगर कुछ रोज़ में ही फिर नए पत्ते निकल आए।
हमारे आपके खुद चाहने भर से ही क्या होगा
घटाएँ भी अगर चाहें तभी अच्छी फसल आए।
हमें बारिश ने मौका दे दिया असली परखने का
जो कच्चे रंग वाले थे वो अपने रंग बदल आए।
जहाँ जिस द्वार पर देखेंगे दाना आ ही जाएँगे
परिन्दों को भी क्या मतलब कुटी आए महल आए।
हमारा क्या हम अपनी दुश्मनी भी भूल जाएँगे
मगर उस ओर से भी दोस्ती की कुछ पहल आए।
अभी तो ताल सूखा है अभी उसमें दरारें हैं
पता क्या अगली बरसातों में उसमें भी कमल आए।
-कमलेश भट्ट कमल
Sunday, July 30, 2006
दो ग़ज़लें

[ 1]
उस पर जाने किस किसका तो बंधन होता है
अपना मन भी आखिर कब अपना मन होता है ।
तन से मन की सीमा का अनुमान नहीं लगता
तन के भीतर ही मीलों लम्बा मन होता है ।
वह भी क्या जानेगा सागर की गहराई को
जिसका उथले तट पर ही देशाटन होता है ।
अँधियारा क्या घात लगाएगा उस देहरी पर
जिस घर रोज उजालों का अभिनन्दन होता है ।
दुख की भाप उठा करती हैसुख के सागर से
ऐसा ही, ऐसा ही शायद जीवन होता है ।
हम-तुम सारे ही जिसमें किरदार निभाते हैं
पल-पल छिन-छिन उस नाटक का मंचन होता है ।
तन की आँखें तो मूरत में पत्थर देखेंगी
मन की आँखों से ईश्वर का दर्शन होता है ।
-कमलेश भट्ट कमल
[ 2]
मन नहीं बदले अगर तो सिर्फ तन से क्या ?
आये दिन के कीर्तन से या भजन से क्या ?
जो उजाला या तपिश कुछ भी न दे जाए
वह जले या बुझ भी जाए, उस अगन से क्या ?
बन्दिशें ही बन्दिशें जब हों उड़ानों पर
पंछियों को फिर परों से या गगन से क्या ?
आपके घर में हवा है और ताज़ा है
आपको माहौल की गहरी घुटन से क्या ?
ज़हनियत का भी पता देते हैं खुद कपड़े
ज़हनियत मर जाए तो फिर तन-बदन से क्या ?
जब गरीबों का कहीं कोई न अपना हो
मुल्क की सारी व्यवस्था से सदन से क्या ?
जो अँधेरों की तरफदारी में शामिल हो
वह किरन भी हो अगर तो उस किरन से क्या ?
-कमलेश भट्ट कमल
Sunday, July 23, 2006
गजल
कभी सुख का समय बीता, कभी दुख का समय गुजरा
अभी तक जैसा भी गुजरा मगर अच्छा समय गुजरा !
अभी कल ही तो बचपन था अभी कल ही जवानी थी
कहाँ लगता है इन आँखों से ही इतना समय गुजरा !
बहुत कोशिश भी की, मुट्ठी में पर कितना पकड़ पाए
हमारे सामने होकर ही यूँ सारा समय गुजरा !
झपकना पलकों का आँखों का सोना भी जरूरी है
हमेशा जागती आँखों से ही किसका समय गुजरा !
उन्हीं पेडों पे फिर से आ गए कितने नए पत्ते
उन्हीं से जैसे ही पतझार का रूठा समय गुजरा !
हमें भी उम्र की इस यात्रा के बाद लगता है
न जाने कैसे कामों में यहाँ अपना समय गुजरा !
-कमलेश भट्ट कमल
Monday, July 18, 2005
परिचय
जन्म- 13 फरवरी 1959 ई॰ को सुल्तानपुर(उ॰प्र॰)की कादीपुर तहसील के ज़फरपुर नामक गाँव में।
शिक्षा- एम॰एस-सी॰ (साँख्यिकी)
सृजन- ग़ज़ल, कहानी, हाइकु, साक्षात्कार, निबन्ध, समीक्षा एवं बाल-साहित्य आदि विधाओं में।
कृतियाँ-
* त्रिवेणी एक्सप्रेस (कहानी संग्रह)
* चिट्ठी आई है (कहानी संग्रह)
* नखलिस्तान (कहानी संग्रह)
* सह्याद्रि का संगीत (यात्रा वृतान्त)
* साक्षात् (लघुकथा पर डॉ॰ कमल किशोर गोयनका से बातचीत)
* मंगल टीका (बाल कहानियाँ)
* शंख सीपी रेत पानी (ग़ज़ल संग्रह)
* अजब गजब ( बाल कविताएँ)
* तुर्रम (बाल उपन्यास)
* संस्कृति के पड़ाव
* मैं नदी की सोचता हूँ (गजल संग्रह)-2009
* अमलतास (हाइकु संग्रह)-2009
*** (उ॰प्र॰ हिन्दी संस्थान द्वारा मंगल टीका एवं शंख सीपी रेत पानी पर 20-20 हजार रुपए का नामित पुरस्कार तथा नखलिस्तान के लिए सर्जना पुरस्कार)
*** परिवेश सम्मान-2000
***आर्य स्मृति साहित्य सम्मान -2005
संपादन-
* शब्द साक्षी (लघु कथा संकलन)
* हाइकु - 1889 (हाइकु संकलन)
* हाइकु - 1899 (हाइकु संकलन)
सम्प्रति- उ॰प्र॰ के वाणिज्य कर विभाग में डिप्टी कमिश्नर
सम्पर्क-
के॰एल॰ 154, कवि नगर
गाजियाबाद- 201002
दूरभाष- 0120- 2701629
मोबा॰- 09968296694
ई-मेल- kmlshbhatt@yahoo.co.in
kamalesh.bhatt@gmail.com
जालघर- www.gazalkamal.blogspot.com
www.kamleshbhatt-kamal.blogspot.com
अनुभूति पर कविताएँ और परिचय gg
चिट्ठी आई है gg
हिन्दी नेस्ट पर कहानी gg
* कविता कोश में
Sunday, May 01, 2005
उ०प्र०हिन्दी संस्थान का पुरस्कार
कमलेश भट्ट कमल के ग़ज़ल संग्रह शंख सीपी रेत पानी को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा निराला पुरस्कार रु० २०००० का पुरस्कार प्रदान किया गया है। कमलेश जी को हिन्दी साहित्य टीम की ओर से हार्दिक बधाई।
–संपादक हिन्दी साहित्य टीम
चिट्ठी आई है (कहानी)gg
हाइकु कानन यहाँ देखें gg
सरल चेतना को यहाँ देखें gg
बालफुलबारी को यहाँ देखें gg
हिन्दी गगन
Saturday, April 23, 2005
कमलेश भट्ट कमल के हाइकु
कौन मानेगा
सबसे कठिन है
सरल होना.
फूल सी पली
ससुराल में बहू
फूस सी जली.
हज़ार हाथों
वृक्षों ने की दुआएँ
हमने नहीं।
दोनों तय हैं
अँधेरे का छँटना
भोर का होना।
अँधेरे का छँटना
भोर का होना।
कौन–सी खुशी
उजागर करते
रोज फव्वारे।
उजागर करते
रोज फव्वारे।
दहला गयी
मौन बैठे ताल को
नन्हीं कंकरी।
मौन बैठे ताल को
नन्हीं कंकरी।
धूल ढँकेगी
पत्तों की हरीतिमा
कितने दिन।
पत्तों की हरीतिमा
कितने दिन।
पल को सही
तोड़ा तो जुगुनू ने
रात का अहं।
तोड़ा तो जुगुनू ने
रात का अहं।
हरेक दुखी
दुखियारे जग में
कौन है सुखी।
दुखियारे जग में
कौन है सुखी।
गगन में ही
कब तक उड़ेंगे
धरा के पंक्षी।
कब तक उड़ेंगे
धरा के पंक्षी।
तोड़ देता है
झूठ के पहाड़ को
राई–सा सच।
झूठ के पहाड़ को
राई–सा सच।
आते ही आते
तानाशाह सूर्य ने
दिए बुझाए।
तानाशाह सूर्य ने
दिए बुझाए।
मुश्किलों से
मुश्किलों से जूझता लड़ता रहेगा
आदमी हर हाल में ज़िन्दा रहेगा।
मंज़िलें फिर–फिर पुकारेंगी उसे ही
मंज़िलों की ओर जो बढ़ता रहेगा।
आँधियों का कारवाँ निकले तो निकले
पर दिये का भी सफर चलता रहेगा।
कल भी सब कुछ तो नहीं इतना बुरा था
और कल भी सब नहीं अच्छा रहेगा।
झूठ अपना रंग बदलेगा किसी दिन
सच मगर फिर भी खरा–सच्चा रहेगा।
देखने में झूठ का भी लग रहा है
बोलबाला अन्ततः सच का रहेगा।
–कमलेश भट्ट कमल
आदमी को खुशी
आदमी को खुशी से ज़ुदा देखना
ठीक होता नहीं है बुरा देखना।
पुण्य के लाभ जैसा हमेशा लगे
एक बच्चे को हँसता हुआ देखना।
रोशनी है तो है ज़िन्दगी ये जहाँ
कौन चाहेगा सूरज बुझा देखना।
सर–बुलन्दी की वो कद्र कैसे करे
जिसको भाता हो सर को झुका देखना।
ज़िन्दगी खुशनुमा हो‚ नहीं हो‚ मगर
ख़्वाब जब देखना‚ खुशनुमा देखना।
सारी दुनिया नहीं काम आएगी जब
काम आएगा तब भी खुदा‚ देखना।
ठीक होता नहीं है बुरा देखना।
पुण्य के लाभ जैसा हमेशा लगे
एक बच्चे को हँसता हुआ देखना।
रोशनी है तो है ज़िन्दगी ये जहाँ
कौन चाहेगा सूरज बुझा देखना।
सर–बुलन्दी की वो कद्र कैसे करे
जिसको भाता हो सर को झुका देखना।
ज़िन्दगी खुशनुमा हो‚ नहीं हो‚ मगर
ख़्वाब जब देखना‚ खुशनुमा देखना।
सारी दुनिया नहीं काम आएगी जब
काम आएगा तब भी खुदा‚ देखना।
***
–कमलेश भट्ट कमल
–कमलेश भट्ट कमल
किसे मालूम
किसे मालूम‚ चेहरे कितने आखिरकार रखता है
सियासतदाँ है वो‚ खुद में कई किरदार रखता है।
किसी भी साँचे में ढल जाएगा अपने ही मतलब से
नहीं उसका कोई आकार‚ हर आकार रखता है।
निहत्था देखने में है‚ बहुत उस्ताद है लेकिन
ज़ेहन में वो हमेशा ढेर सारे वार रखता है।
ज़मीं तक है नहीं पैरों के नीचे और दावा है
वो अपनी मुट्ठियों में बाँधकर संसार रखता है।
बचाने के लिए खुद को‚ डुबो सकता है दुनिया को
वो अपने साथ ही हरदम कई मझधार रखता है।
–कमलेश भट्ट कमल





